दश इन्द्रियहरू

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बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात् ।
वाक्पाणिपादाः गुदमप्युपस्थः कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु ।।९४।।

कान, छाला, आँखा, नाक र जिब्रोबाट विषयको ज्ञान हुने हुँदा (यिनीहरूलाई) ज्ञानेन्द्रिय भनिन्छ । त्यस्तै वाणी, हात, खुट्टा, गुहद्वार र जनेन्द्रिय कर्ममा व्यग्र (लिप्त) हुने हुँदा कर्मेन्द्रिय भनिन्छ । ।।९४।।

स्थूल शरीरमा स्थित ज्ञानेन्द्रिय र कर्मेन्द्रीयबाट जीवले भोगकर्म गर्दछ । यिनीहरूको व्याख्या गर्दै यो श्लोकमा भनिएको छ – देहमा स्थित पाँच इन्द्रियबाट पाँच विषय (शब्द, स्पर्श, दृश्य, गन्ध, रस) को ज्ञान हुन्छ; यिनीहरूलाई ज्ञानेन्द्रिय भनिन्छ । त्यस्तै शरीरका अङ्ग वाणी (मुख), पाणी (हात), खुट्टा, गुहद्वार र जनेन्द्रिय आ—आफ्ना धर्मअनुसारको कर्म गर्दछन् । यिनीहरूलाई कर्मेन्द्रीय भनिन्छ । ज्ञानेन्द्रिय र कर्मेन्द्रियको क्रियाहरूको सम्बन्ध मन अनि वासना हुँदै जीव–बबन्धनसम्म विस्तार भएकाले मोक्षका साधकहरूले देह, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, मन, वासना अनि बन्धनको अन्योन्याश्रित सम्बन्धलाई गहिराइमा बुझ्न अत्यन्त आवश्यक छ ।

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