प्राणको धर्म

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उच्छ्वास, क्षुधा, पीपासा आदि प्राणको धर्महरूको व्याख्या तलको श्लोकमा गरिएको छ ।

उच्छ्वासनिःश्वासविजृम्भणक्षुत्प्रस्पन्दनाद्युत्क्रमणादिकाः क्रियाः ।
प्राणादिकर्माणि वदन्ति तज्ज्ञाः प्राणस्य धर्मावशनापिपासे ।।१०४।।

श्वासप्रश्वास, हाच्छियूँ, झुल्नु, काँप्नु, उछल्नु (उफ्रिनु) आदि क्रियाहरूलाई प्राणका विशेषज्ञले प्राणादिको कर्म भनेका छन् । भोक र प्यास पनि प्राणका धर्म हुन् । ।।१०४।।

प्राण, अपान, समान, उदान, र व्यान पाँच मुख्य प्राण हुन् । त्यस्तै नाग, कर्म, कृकर, देवदत्त र धनञ्जय पाँच उपप्राण हुन् । यो श्लोकमा भनिएको छ – श्वासप्रश्वास, हाच्छियूँ, झुल्नु, काँप्नु आदि प्राणादि कर्मदेखि लिएर भोक प्यास आदि प्राणका धर्महरू सम्पूर्ण प्राणसँग सम्बन्धित छन् । आत्मा प्राणादि धर्महरूबाट पूर्णत असंग छ । निद्रा अवस्थामा मनुष्यलाई भोक–प्यास लाग्दैन । किनकि त्यो अवस्थामा प्राण मनुष्यको देहमा अभिमान रहँदैन । त्यस्तै, मृत व्यक्तिलाई पनि भोक–प्यास लाग्दैन । किनकि त्यो प्राण गइसकेको अवस्था हो ।

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