मंगलाचरण

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सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं तमगोचरम् ।
गोविन्दं परमानन्दं सद्गुरुं प्रणतोऽस्म्यहम् ।। १ ।।

जो इन्द्रियहरूद्वारा अज्ञेय (अदृश्य) भए तापनि सर्ववेदान्तका सिद्धान्तहरूद्वारा ज्ञेय (जान्न, बुझ्न) सकिन्छ, त्यस्ता परमान्द स्वरूप सद्गुरु श्रीगोविन्दलाई नै प्रणाम गर्दछु । ।।१।।

यो ग्रन्थको प्रथम श्लोकमा आदि शंकराचार्य आफ्नो श्रद्वेय गुरु श्री गोविन्द पादलाई स्मरण गर्दै वन्दना गर्नुहुन्छ । यो प्राचीन गुरु–शिष्य परम्परामा गुरुप्रति दर्शाइने श्रद्धाको अनुपम उदाहरण हो ।

“गुरु श्रीगोविन्दपाद, जो स्वयं देहधारी पुरुष हुनुहुन्थ्यो, लाई परमात्मा स्वरूप अनि अज्ञेय (जान्न, बुझ्न नसकिने) भएर पनि वेदान्तका सिद्धान्तद्वारा ज्ञेय हुनुहुन्छ”, भनी सम्बोधन गरी वेदान्त दर्शनको मूलमर्मलाई प्रथम–श्लोकमा उद्वासित गर्नुभएको छ ।

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